मुंबई। मुंबई के घाटकोपर पूर्व स्थित राजावाड़ी अस्पताल पर एक गर्भवती महिला ने डॉक्टरों और स्टाफ की घोर लापरवाही का गंभीर आरोप लगाया है। गोवंडी की रहने वाली 33 वर्षीय हीरा भंडारी का दावा है कि अस्पताल प्रबंधन की सुस्ती और टालमटोल वाले रवैये के कारण उनके अजन्मे बच्चे की गर्भ में ही मौत हो गई।
पीड़िता के अनुसार, डॉक्टरों ने बीते 19 अगस्त को ही आपातकालीन सिजेरियन सेक्शन डिलीवरी कराने की लिखित सलाह दी थी, लेकिन अस्पताल का स्टाफ डिलीवरी करने के बजाय उन्हें एक हफ्ते तक सिर्फ सोनोग्राफी कराने की बात कहकर टालता रहा।
नतीजतन, ठीक एक सप्ताह बाद डॉक्टरों ने उनके बच्चे को मृत घोषित कर दिया।अस्पताल प्रशासन पर तीखे सवाल उठाते हुए हीरा भंडारी ने कहा, “मुझे लगातार यही भरोसा दिया जाता रहा कि मेरा बच्चा पूरी तरह ठीक है। अगर 19 अगस्त को डॉक्टरों ने सी-सेक्शन की सलाह दी थी, तो इसका साफ मतलब था कि बच्चा पूरा विकसित हो चुका था और उसे फौरन बाहर निकालना जरूरी था। फिर उन्होंने इस प्रक्रिया में इतनी घातक देरी क्यों की?”
अस्पताल से नहीं मिली कोई मदद
भंडारी ने बताया कि 24 अगस्त की आधी रात को जब उन्हें बच्चे की हलचल महसूस नहीं हुई, तो वे फिर से अस्पताल गईं। दो बच्चों की मां हीरा ने कहा कि उस रात भी उन्होंने सिर्फ सोनोग्राफी की और कहा कि बच्चा ठीक है। उन्होंने एक बार भी किसी खतरे का अंदेशा नहीं जताया।
स्टाफ ने मुझसे सिर्फ इतना कहा कि जब पेट में बच्चा बड़ा हो जाता है, तो उसकी हलचल कम हो जाती है। उस रात उन्होंने फिर मुझे दो दिन बाद, 26 अगस्त को आने के लिए कहा।
26 अगस्त की सुबह करीब 7 बजे अस्पताल पहुंचने के बाद, भंडारी को कथित तौर पर 10 बजे तक इंतजार कराया गया। उन्होंने बताया कि सुबह 10 बजे की सोनोग्राफी के बाद डॉक्टरों ने फिर कहा कि बच्चा ठीक है। लेकिन एक घंटे बाद, करीब 11 बजे, जब मुझे पेट में दर्द महसूस हुआ, तो उन्होंने दोबारा सोनोग्राफी की और घोषित कर दिया कि मेरे बच्चे की गर्भ में ही मौत हो गई है।
डॉक्टरों की बात सुनकर पूरा परिवार सदमे में आ गया। भंडारी की बहन सोनी पाटिल ने कहा कि जब हमने जवाब मांगा, तो अलग-अलग डॉक्टरों ने कई कारण बताए, गर्भ में पानी के असंतुलन से लेकर पीलिया तक। कोई भी मामले को गंभीरता से नहीं ले रहा था।
जब हमने विरोध जताना शुरू किया, तो अन्य गर्भवती महिलाओं के कुछ रिश्तेदार भी हमारे साथ आ गए और बताया कि कुछ दिन पहले उनके साथ भी ऐसा ही हुआ था। अंत में, हम 26 अगस्त को तिलक नगर पुलिस स्टेशन गए, लेकिन वहां एक महिला अधिकारी ने मेरी बहन की सास को पुलिस स्टेशन से बाहर निकाल दिया।
क्या कहती है पुलिस?
यह पूछे जाने पर कि 26 अगस्त की शाम को लिखित शिकायत क्यों नहीं ली गई, उस समय ड्यूटी पर मौजूद एपीआई सरिता मनवर ने कहा कि उस दिन परिवार हमारे पास कभी नहीं आया। हमें राजावाड़ी अस्पताल से फोन आया था कि एक गर्भवती महिला के गर्भ में बच्चे की मौत के बाद कुछ रिश्तेदारों ने हंगामा किया है।
हम तुरंत अस्पताल पहुंचे। मैंने गणेश भंडारी (हीरा के पति) के साथ बैठकर उन्हें समझाया और सलाह दी कि वे अपने बच्चे का शव अभी न लें क्योंकि इससे जांच करने में मुश्किल होगी।
लेकिन वे कुछ भी समझने की स्थिति में नहीं थे। और किसी ने भी उनके रिश्तेदारों को पुलिस स्टेशन से बाहर नहीं निकाला। हमने उन्हें केवल महिला वार्ड और ओटी परिसर से बाहर जाने को कहा था क्योंकि वहां अन्य गर्भवती महिलाएं थीं, जिन्हें संक्रमण का खतरा हो सकता था।”
सीनियर पीआई संतोष धेमरे ने शुक्रवार को बताया कि हमने मामले की जांच की है और अस्पताल से दस्तावेज व रिपोर्ट जमा करने को कहा है। हमने गुरुवार को सभी के बयान भी दर्ज कर लिए हैं। हम सभी दस्तावेज जेजे अस्पताल की लापरवाही जांच समिति को भेजेंगे और उनकी सिफारिशों के आधार पर कार्रवाई करेंगे।”
अस्पताल ने भी रखा अपना पक्ष
राजावाड़ी अस्पताल प्रशासन ने इस बात से इनकार किया कि उनका ओटी काम नहीं कर रहा था। प्रशासन ने कहा कि सभी चिकित्सा सुविधाओं को मेंटेनेंस की आवश्यकता होती है। अगर एक ओटी में मेंटेनेंस का काम चल रहा है, तो दूसरा हमेशा उपलब्ध रहता है।
26 अगस्त को कम से कम पांच से छह सी-सेक्शन किए गए। दुर्भाग्य से, जब हीरा के बच्चे की धड़कन जांची गई, तो वह सुनाई नहीं दी। इसलिए हमने सोनोग्राफी की, जिससे हमें पता चला कि बच्चे की मौत हो चुकी है।