मुंबई। आगामी गणेशोत्सव में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) की मूर्तियों के इस्तेमाल को लेकर चल रहे विवाद के बीच बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील पर अपना स्पष्ट रुख बताने को कहा है।
कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि जब प्रधानमंत्री स्वयं लोगों से पर्यावरण अनुकूल मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं स्थापित करने का आग्रह कर चुके हैं तो इस संबंध में सरकार का क्या दृष्टिकोण है।
कोर्ट ने सरकार से रुख स्पष्ट करने को कहा
न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ मंगलवार को पीओपी की मूर्तियों पर रोक से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य के महाधिवक्ता मिलिंद साठे से इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष स्पष्ट करने को कहा। महाधिवक्ता ने कोर्ट से समय मांगा, जिस पर खंडपीठ ने उन्हें बुधवार तक अपना रुख स्पष्ट करने की मोहलत दे दी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रसारित ‘मन की बात’ कार्यक्रम का उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम में देशवासियों से इस वर्ष गणेशोत्सव के दौरान पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाओं का उपयोग करने की अपील की थी। कोर्ट ने इसी संदर्भ में राज्य सरकार से पूछा कि वह प्रधानमंत्री की इस अपील को किस प्रकार देखती है।
गौरतलब है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 2020 में जारी दिशा-निर्देशों में प्लास्टर आफ पेरिस से बनी मूर्तियों के उपयोग पर रोक लगाने की सिफारिश की थी।
हालांकि, पिछले वर्ष सुनवाई के दौरान सीपीसीबी ने कोर्ट को बताया था कि उसके दिशा-निर्देश अनिवार्य नहीं, बल्कि सलाहकारी प्रकृति के हैं। इसके बाद हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की 2025 की नीति के अनुरूप छह फीट से ऊंची पीओपी की प्रतिमाओं के प्राकृतिक जलाशयों में विसर्जन की अनुमति दी थी।
इस मामले में दायर जनहित याचिकाओं में सीपीसीबी के दिशा-निर्देशों को सख्ती से लागू करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पीओपी की प्रतिमाएं जल प्रदूषण का बड़ा कारण बनती हैं और इनके उपयोग पर प्रभावी रोक जरूरी है।
दूसरी ओर पीओपी मूर्ति निर्माताओं ने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनका तर्क है कि यदि पीओपी की मूर्तियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है तो इससे उनका कारोबार प्रभावित होगा और संविधान द्वारा प्रदत्त व्यापार करने के मौलिक अधिकार का हनन होगा।
ऐसे में अदालत के समक्ष पर्यावरण संरक्षण और हजारों कारीगरों की आजीविका के बीच संतुलन बनाने की चुनौती भी बनी हुई है। अब बुधवार को राज्य सरकार के स्पष्ट रुख पर इस मामले की आगे की सुनवाई होगी।